
स्वतंत्रता दिवस: आजादी के 80 साल
15 अगस्त 2026 को भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। यह दिन देश की आजादी के लिए संघर्ष करने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग और बलिदान को याद करने का अवसर है। हर साल लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराया जाता है और प्रधानमंत्री देश को संबोधित करते हैं। समारोह में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ प्रमुख रूप से शामिल रहता है। लेकिन इस बार स्वतंत्रता दिवस समारोह में एक खास बदलाव देखने को मिला। 150 वर्ष पूरे कर चुके ‘वंदे मातरम्’ को पहली बार लाल किले के स्वतंत्रता दिवस समारोह के आधिकारिक कार्यक्रम में शामिल किया गया।
लाल किले से पहली बार गूंजा ‘वंदे मातरम्’
15 अगस्त 2026 को लाल किले पर आयोजित 80वें स्वतंत्रता दिवस समारोह में ‘वंदे मातरम्’ को आधिकारिक कार्यक्रम का हिस्सा बनाया गया। इस साल का समारोह ‘150 Years of Vande Mataram’ और ‘Yuva Shakti for Viksit Bharat@2047’ की थीम पर केंद्रित है।
इससे पहले स्वतंत्रता दिवस के मुख्य समारोह में ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान के रूप में निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत प्रमुख भूमिका में रहता था। वहीं ‘वंदे मातरम्’ के लिए ऐसा अनिवार्य प्रोटोकॉल नहीं था।
इतने वर्षों तक ‘वंदे मातरम्’ क्यों नहीं होता था?
यह समझना जरूरी है कि ‘वंदे मातरम्’ पर कभी प्रतिबंध नहीं था। इसे स्कूलों, सरकारी कार्यक्रमों और दूसरे राष्ट्रीय आयोजनों में पहले भी गाया जाता रहा है। अंतर सिर्फ दोनों की आधिकारिक भूमिका का था।
‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रीय गान है, जबकि ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रीय गीत है। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा ने ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया और ‘वंदे मातरम्’ को भी स्वतंत्रता संग्राम में उसकी ऐतिहासिक भूमिका के कारण समान सम्मान देने का निर्णय लिया।
इसलिए लाल किले के मुख्य समारोह में ‘जन गण मन’ का निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुसार होना जारी रहा, जबकि ‘वंदे मातरम्’ के लिए कोई ऐसा अनिवार्य क्रम नहीं था।

2026 में क्या बदला?
इस बदलाव की बड़ी वजह ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे होना है। केंद्र सरकार ने 2025-26 में इसके 150वें वर्ष को विशेष रूप से मनाने का फैसला किया।
गृह मंत्रालय ने 2026 में राष्ट्रीय गीत के गायन और वादन को लेकर नए निर्देश भी जारी किए। इसी विशेष वर्ष और नए दिशा-निर्देशों की पृष्ठभूमि में इस बार ‘वंदे मातरम्’ को लाल किले के स्वतंत्रता दिवस समारोह में आधिकारिक स्थान मिला।
संसद में भी हुई विशेष चर्चा
‘वंदे मातरम्’ के 150वें वर्ष के अवसर पर दिसंबर 2025 में संसद के दोनों सदनों में विशेष चर्चा हुई। लोकसभा में 8 दिसंबर को और राज्यसभा में 9, 10 और 11 दिसंबर को इस विषय पर चर्चा की गई।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में चर्चा की शुरुआत करते हुए स्वतंत्रता आंदोलन में ‘वंदे मातरम्’ की भूमिका और इसके ऐतिहासिक महत्व पर बात की। इस चर्चा ने राष्ट्रीय गीत को लेकर देशव्यापी विमर्श को और बढ़ाया।

‘वंदे मातरम्’ का इतिहास
‘वंदे मातरम्’ की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने की थी। इसे बाद में उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत राष्ट्रीय चेतना और ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष का महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया।
1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने इसे गाया था। इसके बाद यह स्वतंत्रता आंदोलन में बेहद लोकप्रिय हुआ।
निष्कर्ष
15 अगस्त 2026 का स्वतंत्रता दिवस समारोह ‘वंदे मातरम्’ के लिए ऐतिहासिक बन गया। 150वें वर्ष के अवसर पर संसद में हुई विशेष चर्चा, गृह मंत्रालय के नए निर्देश और अब लाल किले के समारोह में इसकी प्रस्तुति ने इसे एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
हालांकि ‘वंदे मातरम्’ पहले भी गाया जाता रहा है, लेकिन इस बार पहली बार इसे लाल किले के स्वतंत्रता दिवस समारोह के आधिकारिक कार्यक्रम में विशेष स्थान मिला। वहीं ‘जन गण मन’ राष्ट्रगान के रूप में अपनी जगह पर कायम है और ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रीय गीत के रूप में देश की स्वतंत्रता चेतना का प्रतीक बना हुआ है।

